Wednesday, September 20, 2023

सावधान! जरूरत से ज्यादा कॉर्नफ्लेक्स का सेवन सेहत को पहुंचा सकता है नुकसान, जानें कैसे और क्या हैं नुकसान Side Effects

Cornflakes Side Effects Hindi: हममें से ज्यादातर लोग कॉर्नफ्लेक्स का सेवन ब्रेकफास्ट में करना पसंद करते हैं. कॉर्नफ्लेक्स एक क्विक और हेल्दी नाश्ता माना जाता है. जिसे बच्चे से लेकर बड़े तक खाना पसंद करते हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कॉर्नफ्लेक्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू जीरो है. इसके सेवन से आपके शरीर में केवल कैलोरी की मात्रा बढ़ती है. इसके अलावा इसमें सोडियम, कार्बोहाइड्रेट, कॉर्नसिरप और वनस्पति तेल मिलाया जाता है, जो आपकी सेहत के लिए फायदेमंद नहीं होता. यानि जिसे हम हेल्दी नाश्ता समझ कर खाते हैं वो सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. तो चलिए जानते हैं कॉर्नफ्लेक्स खाने के नुकसान.

कॉर्नफ्लेक्स खाने के नुकसान-  Cornflakes Khane Ke Nuksan: 

1. डायबिटीज-

डायबिटीज के मरीजों के लिए कॉर्नफ्लेक्स का सेवन नुकसानदायक माना जाता है. कॉर्नफ्लेक्स का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत अधिक होता है, जो डायबिटीज की समस्या को बढ़ा सकता है. इतना ही नहीं इसका रोजाना सेवन हार्ट के लिए हानिकारक हो सकता है. 

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2. मोटापा- 

बहुत से लोग ऐसे हैं जो वजन कम करने के लिए डाइट करते हैं. और ब्रेकफास्ट में कॉर्नफ्लेक्स खाना पसंद करते हैं. लेकिन आपको बता दें इसमें स्वीटनर का इस्तेमाल काफी मात्रा में किया जाता है जो वजन को बढ़ाने का काम कर सकता है. 

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3. पाचन-

पाचन संबंधी समस्या से परेशान हैं तो नाश्ते में कॉर्नफ्लेक्स का सेवन करने से बचें. क्योंकि रोजाना इसका सेवन करने से फाइबर की कमी हो सकती है जिससे पाचन जैसी दिक्कत हो सकती है.



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मथुरा के शाही ईदगाह में साइंटिफिक सर्वे की मांग को लेकर SC में याचिका दाखिल, 22 सितंबर को होगी सुनवाई

मथुरा श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक याचिका दायर की गई है. याचिका में शाही ईदगाह (Shahi Eidgah) में ज्ञानवापी परिसर जैसे साइंटिफिक सर्वे की मांग की गई है. सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर 22 सितंबर को सुनवाई करेगी. जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच इस मामले पर सुनवाई करेगी. कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट की तरफ से यह याचिका दाखिल की गई है. श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष आशुतोष पांडेय ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाखिल की है.

गौरतलब है कि जुलाई में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शाही ईदगाह की साइंटिफिक सर्वे कराने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था.  कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.  याचिका में ट्रस्ट ने 1968 में हुए समझौते की वैधता के खिलाफ तर्क देते हुए इसे दिखावा और धोखाधड़ी बताया है.  याचिका मे कहा गया है कि भूमि को आधिकारिक तौर पर 'ईदगाह' नाम के तहत पंजीकृत किया ही नहीं जा सकता है. क्योंकि इसका टैक्स 'कटरा केशव देव, मथुरा' के उपनाम के तहत एकत्र किया जा रहा है.

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"महिला आरक्षण बिल का हमेशा से समर्थन, लेकिन सरकार को इन सवालों का देना होगा जवाब..": मल्लिकार्जुन खरगे

नए संसद भवन (New Parliament House) के लोकसभा में मंगलवार (19 सितंबर) को 128वां संविधान संशोधन बिल यानी नारी शक्ति वंदन विधेयक पेश किया गया. महिला आरक्षण बिल (Women's Reservation Bill) के मुताबिक लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% रिजर्वेशन लागू किया जाएगा. लोकसभा (Loksabha) की 543 सीटों में 181 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. लोकसभा में इस बिल पर कल 20 सितंबर को सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक बहस होगी. इससे पहले विपक्षी दलों के नेताओं की इस बिल पर मिलीजुली प्रतिक्रिया आ रही है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) ने केंद्र सरकार पर महिला आरक्षण बिल को लेकर धोखा देने का आरोप लगाया है. 

मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X(पहले ट्विटर) पर लिखा- "महिला आरक्षण विधेयक का हमने हमेशा से समर्थन किया है. 2010 में राज्यसभा में कांग्रेस-यूपीए सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पास करवाया था. राजनीति में जिस प्रकार SC-ST वर्ग को संवैधानिक अवसर मिला है, उसी प्रकार OBC वर्ग की महिलाएं समेत सभी को इस विधयेक से सामान मौका मिलना चाहिए. आज जो मोदी सरकार विधेयक लाई है, उसको गौर से देखने की ज़रुरत है. विधेयक के मौजूदा प्रारूप में लिखा है कि ये Decadal Census (जनगणना) और Delimitation (परिसीमन) के बाद ही लागू किया जाएगा. इसका मतलब, मोदी सरकार ने शायद 2029 तक महिला आरक्षण के दरवाज़े बंद कर दिए हैं. बीजेपी को इस पर स्पष्टीकरण देना चाहिए."


कांग्रेस ने भी सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
कांग्रेस ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया X अकाउंट पर जारी एक पोस्ट में मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है. कांग्रेस ने लिखा- “महिला आरक्षण बिल की क्रोनोलॉजी समझिए. यह बिल आज पेश जरूर हुआ, लेकिन हमारे देश की महिलाओं को इसका फायदा जल्द मिलते नहीं दिखता. ऐसा क्यों? क्योंकि यह बिल जनगणना के बाद ही लागू होगा. आपको बता दें 2021 में ही जनगणना होनी थी, जो कि आज तक नहीं हो पाई. आगे यह जनगणना कब होगी इसकी भी कोई जानकारी नहीं है. खबरों में कहीं 2027 तो कहीं 2028 की बात कही गई है. इस जनगणना के बाद ही परिसीमन या निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण होगा, तब जाकर महिला आरक्षण बिल लागू होगा."

कांग्रेस ने आगे लिखा-  "मतलब पीएम मोदी ने चुनाव से पहले एक और जुमला फेंका है और यह जुमला अब तक का सबसे बड़ा जुमला है. मोदी सरकार ने हमारे देश की महिलाओं के साथ विश्वासघात किया है, उनकी उम्मीदों को तोड़ा है.” ऐसी ही एक और पोस्ट में कांग्रेस ने लिखा है, “अभी लागू नहीं होगा महिला आरक्षण बिल. जानें क्यों?"

महिला आरक्षण बिल कानून बन भी गया तो क्या फंसा है पेंच
आला सरकारी सूत्र के मुताबिक, महिला आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से संभव हो सकता है. आरक्षण को अमली जामा पहनाने के लिए लंबी संवैधानिक प्रक्रिया है. इस बिल को 50 प्रतिशत राज्य विधानसभाओं की मंजूरी की जरुरत नहीं है. यानी संसद से पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये कानून बन जाएगा. लेकिन सरकार सबसे पहले नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के रूल्स नोटिफाई करेगी. इसके बाद जनगणना का काम शुरू होगा. उसके बाद परिसीमन आयोग लोकसभा और विधानसभा परिसीमन का काम पूरा करेगा. महिला आरक्षण कानून जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू होगा.


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Tuesday, September 19, 2023

भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक दिन, पुराने से नए भवन में शिफ्ट होगी संसद, जानिए क्‍या होगा अंतर

भारतीय लोकतंत्र के लिए आज का दिन ऐतिहासिक होने वाला है. आज देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी हमारी संसद 75 कदम में 75 सालों का इतिहास पार कर एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है. सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद संविधान की एक प्रति लेकर पैदल पुराने संसद भवन से नए संसद भवन तक जाएंगे. उनके पीछे राज्‍यसभा और लोकसभा के सभी सांसद पैदल चलते हुए नए संसद भवन में प्रवेश करेंगे. संसद के विशेष सत्र के दूसरे दिन आज संसद की कार्यवाही की शुरुआत पुराने संसद भवन से होगी. सुबह 11 बजे सेंट्रल हॉल में दोनों सदनों की संयुक्‍त कार्यवाही शुरू होगी, जहां सभी सांसद अपनी बातें संक्षिप्‍त तरीके से रखेंगे और अपने अनुभव बताएंगे. यह पुरानी संसद को एक भावभीनी विदाई भी होगी. 

संसद की नई इमारत पुराने संसद भवन के बिलकुल पास ही बनी है. इतने पास की हमारे आधुनिक इतिहास के दोनों दौर यहां पर आपस में बात से करते लगते हैं. भारत के लोकतंत्र की धड़कन रहा यह खूबसूरत और ऐतिहासिक संसद भवन 1927 में बनकर तैयार हुआ था, लेकिन आजाद भारत के लिए यहां सबसे पहला और सबसे बड़ा मौका तब आया जब 14-15 अगस्‍त 1947 की मध्‍य रात्रि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यहां से Tryst with Destiny यानी नियति से पूर्व निर्धारित मुलाकात नाम से चर्चित वो ऐतिहासिक भाषण दिया जो आज भी 20वीं सदी के सबसे चर्चित भाषणों में से एक माना जाता है. 

1958 तक इसी इमारत में था सुप्रीम कोर्ट 
इसी पुरानी संसद में संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को देश के नए संविधान को अंगिकार किया. यह संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और इसी के साथ भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणतंत्र बन गया. यह जानना भी बेहद दिलचस्‍प है कि भारत के गणतंत्र बनने के दो दिन बाद 28 जनवरी 1950 को देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट का उद्घाटन भी इसी पुरानी संसद में हुआ. इस संसद में 1958 तक सुप्रीम कोर्ट भी चलती रही, जब तक कि तिलक मार्ग पर संसद की नई इमारत नहीं बन गई. इस लिहाज से यह संसद भवन और भी खास हो जाता है.  

बीते 75 सालों में देश की इस ऐतिहासिक संसद में 17 लोकसभाओं को देश का कानून बनाते हुए देखा, 15 राष्‍ट्रपतियों को देश की कमान संभालते देखा और 14 प्रधानमंत्रियों को देश का कामकाज चलाते हुए देखा. पीएम मोदी ने सोमवार को अपने भाषण में संसद में इतिहास रचने वाले पूर्व प्रधानमंत्रियों का भी जिक्र किया. 

1921 में रखी गई थी आधारशिला 
पुरानी संसद की आधारशिला 102 साल पहले 12 फरवरी 1921 में रखी गई थी. ब्रिटेन के ड्यूक ऑफ कनॉट ने इसकी आधारशिला रखते हुए कहा कि यह भारत के पुनर्जन्‍म और नई ऊंचाइयों पर पहुंचने का प्रतीक बनेगा. छह एकड़ में बनी 560 फीट व्‍यास की इस गोलाकार इमारत को ब्रिटिश आर्किटेक्‍ट सर हरबर्ट बेकन ने डिजाइन किया. सर हरबर्ट बेकन और सर एडविन लुटियंस को दिल्‍ली की रायसीना हिल इलाके में नई राजधानी का डिजाइन तैयार करने का जिम्‍मा मिला था. 

निर्माण में आया था 83 लाख रुपये का खर्च 
सेंट्रल विस्‍टा की आधारिक वेबसाइट के मुताबिक, इस संसद भवन के पत्‍थरों और मार्बल्‍स को शक्‍ल देने के लिए करीब ढाई हजार शिल्पियों को काम पर लगाया गया था. इस गोलाकार संसद के चारों ओर उजले रंग के बलुआ पत्‍थर यानी सेंड स्‍टोन के 144 विशाल खंबे हैं और सबकी लंबाई 27 फीट है. संसद में लगाए गए लाल बलुआ पत्‍थरों को आगरा से लाया गया और इसके लिए एक खास नैरा गेज रेल लाइन बिछाई गई. पुराने संसद भवन को बनाने में आज से 100 साल पहले 83 लाख रुपये का खर्चा आया था और इसे बनने में छह साल लगे. 

लॉर्ड इरविन ने किया था उद्घाटन 
18 जनवरी 1927 को तत्‍कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने इस इमारत का उद्घाटन किया. इस इमारत को पहले काउंसिल हाउस कहा गया, जहां इंपीरियल लेजिस्‍लेटिव काउंसिल यानी ब्रिटिश भारत की विधायिका बैठती थी. भारत में ब्रिटिश राज खत्‍म होने के बाद नया संविधान तैयार करने के लिए संविधान सभा इस संसद में बैठी और 1950 में  संविधान लागू होने पर यह भारतीय संसद कहलाई. 

अब पुरानी संसद का क्‍या होगा?
नई संसद बनने के बाद से ही यह सवाल पूछा जा रहा है कि अब पुरानी संसद का क्‍या होगा. हालांकि अब बताया जा रहा है कि पुरानी संसद को एक संग्रहालय में तब्‍दील कर दिया जाएगा. यहां पर देश-विदेश से जो भी लोग आएंगे वो भारत की संसदीय परंपरा, धरोहर को यहां देख पाएंगे. नई संसद को इस तरह से बनाया गया है कि जो भारत की सांस्‍कृतिक विरासत और परंपरा को सहेज कर रखा जा सके. यहां पर एक एग्जिबिशन भी है. 

नई और पुरानी संसद में यह है अंतर 
- पुरानी संसद की लोकसभा में 543 सीटें हैं. वहीं  नई संसद की लोकसभा में 888 सीटें होंगी, जो 2026 में संसदीय सीटों के नए परिसीमन को देखते हुए बनाई गई है. परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें बढ जाएंगी, जो अभी 543 हैं.  

- पुरानी संसद में संसद के संयुक्‍त सत्र को सेंट्रल हॉल में आयोजित किया जाता था. लेकिन नई संसद में संयुक्‍त सत्र लोकसभा में ही आयोजित किया जाएगा. यहां पर संयुक्‍त सत्र के लिए सीटों की संख्‍या बढ़ाकर 1272 की जा सकती है. 

- नई संसद में एक सेंट्रल लाउंज होगा. यह एक खुला अहाता होगा, जो सांसदों के आपस में घुलने-मिलने की जगह होगा. इस अहाते में देश का राष्‍ट्रीय वृक्ष बरगद लगा हुआ है. 

- पुरानी संसद में जो सेंट्रल हॉल था, वह नई संसद में नहीं होगा. यह सेंट्रल हॉल सांसदों और संसद को कवर करने वाले पत्रकारों के मिलने की एक खास जगह था. 

- नई संसद में एक कांस्‍टीट्यूशनल हॉल होगा, जो पुरानी संसद में नहीं होगा. 

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फैक्ट्री में इस तरीके से बन रहे थे गोल-गप्पे, वीडियो हुआ वायरल तो लोगों के उड़ गए होश

चाहे आप इसे पानी पुरी या गोलगप्पे के रूप में जानते हों, यह साधारण स्ट्रीट स्नैक हर खाने वाले के दिल पर राज करता है. टेस्टी फिलिंग और तीखी चटनी के साथ मसालेदार और चटपटे पानी का कॉम्बिनेशन हमे इसका दीवाना बनाने पर मजबूर कर देता है. हर एक गोलगप्पे को खाने के बाद इसको एक और खाने का मन करता है. हालाँकि, इस स्ट्रीट फूड के इर्द-गिर्द घूमती एकमात्र परेशानी की वजह है साफ-सफाई. जिसमें इस तरह के विचार कि क्या गोलगप्पे खिलाने वाले ने दस्ताने पहने है कि नहीं या क्या वह जिस पानी का इस्तेमाल कर रहा है वो पीने के लिए सही है या नही. ये ऐसे सवाल हैं जो हमें कई बार इनको खाने से रोक देते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि एक वायरल वीडियो ने हमारी इस चिंता को खत्म कर दिया है. गोलगप्पे बनाने का यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है. जिसे देखने के बाद लोगों की चिंता लगभग खत्म हो गई है.

वीडियो, को एक फ़ूड व्लॉगर ने शेयर किया गया था, जो गुजरात के सूरत में एक कारखाने में रिकॉर्ड किया गया था. वीडियो की शुरूआत होती है एक बड़ी सी मशीन में आटे गिरने के साथ . किसी ने आटे की एक पूरी बोरी और उतनी ही मात्रा में पानी एक बड़े कंटेनर में डाल दिया, जिससे आटा गूंथ लिया गया, जिसके बाद आटे को एक फ्लैट शीट में बदल दिया गया. बता दें कि ये सारे काम किसी इंसान ने नहीं किए बल्कि ये पूरा प्रोसेस मशीन से हुआ. इसके बाद इस आटे को एक बड़े रोलप फ्लैट शीट पर रोल किया जाता है और फिर गोल पानी-पूरी तैयार की जाती है. एक बार जब बारीक कटे हुए गोलगप्पे तैयार हो जाते हैं, तो उन्हें एक बड़े फ्रायर में तला जाता है और चलती ट्रे में छान लिया जाता है. अंत में इन्हें एक पैकेट में सील कर दिया जाता है. वीडियो को इस टेक्स्ट के साथ शेयर किया गया था, “सबसे स्वच्छ पानी पुरी.” 

यहां देखें वीडियो

यह क्लिप इंटरनेट पर वायरल हो गई है, कई लोगों ने इतनी सफाई से गोलगप्पे बनाने पर इसकी सराहना भी की है. कई यूजर्स ने दावा किया कि यह पूरे देश में एकमात्र खाने योग्य पानी पुरी है, एक कमेंट में लिखा था, “भारत की एकमात्र खाने जैसी पानीपुरी.” एक यूजर ने इसे "सबसे स्वच्छ पानी पुरी" कहा. कई लोगों ने दावा किया कि भारतीयों को इसका स्वाद पसंद नहीं आएगा, क्योंकि वो गंदगी के आदी हैं. एक दूसरे यूजर ने कमेंट किया, “असली स्वाद तो पसीना और मैल का ही आता है.” “पर भारतीयों को ये पसंद नहीं आएगा”.

आप इस वीडियो के बारे में क्या सोचते हैं? नीचे टिप्पणी में अपने विचार साझा करें।



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"नारी शक्ति आगे बढ़ने का रास्ता है..": महिला आरक्षण बिल पर BJP नेता खुशबू सुंदर

नई दिल्ली: संसद के विशेष सत्र के बीच कैबिनेट की अहम बैठक में महिला आरक्षण बिल को मंजूरी मिल गई है. सुत्रों ने यह जानकारी दी है. हालांकि, सरकार ने अभी तक इसकी घोषणा नहीं की है और कैबिनेट बैठक के कोई प्रेस ब्रीफिंग भी नहीं हुई है. लेकिन, महिला आरक्षण बिल को मंजूरी मिलने पर महिला सांसदों ने इस एतिहासिक क्षण बताया है. बीजेपी नेता खुशबू सुंदर ने कहा कि नारी-शक्ति ही आगे बढ़ने का रास्ता है.

बीजेपी नेता खुशबू सुंदर ने कहा, "क्या ऐतिहासिक क्षण है!! महिला आरक्षण बिल को मंजूरी! जहां हमारे पीएम नरेंद्र मोदी जी महिला सशक्तीकरण के लिए काम कर रहे हैं, वहीं अन्य लोग महिलाओं को नीचे लाते रहते हैं. नारी शक्ति ही आगे बढ़ने का रास्ता है. महिलाओं को सबसे आगे रहना होगा, वे रीढ़ की हड्डी हैं." हमारा देश. केवल देश का सच्चा सपूत ही एक महिला का दर्द समझता है. और हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने इसे फिर से साबित कर दिया. प्रधानमंत्री जी को दिल से धन्यवाद. हमारे देश की महिलाएं हमेशा उनके साथ खड़े रहने और उन्हें अनुमति देने के लिए आपकी आभारी हैं. बढ़ने और ऊंची उड़ान भरने के लिए.”

उद्यमी किरण मजूमदार शॉ ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक एक "अत्यंत आवश्यक विधेयक है जिसे बहुत पहले पारित किया जाना चाहिए था."

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अग्रिम कर भुगतान की वजह से प्रत्यक्ष कर संग्रह में उल्लेखनीय बढ़ोतरी: वित्त मंत्रालय

नई दिल्ली: चालू वित्त वर्ष में सितंबर मध्य तक शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 23.51 प्रतिशत बढ़कर 8.65 लाख करोड़ रुपये रहा है. वित्त मंत्रालय ने सोमवार को यह जानकारी देते हुए कहा कि कंपनियों की ओर से अधिक अग्रिम कर भुगतान की वजह से प्रत्यक्ष कर संग्रह में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. इस दौरान अग्रिम कर भुगतान 21 प्रतिशत बढ़ा है. आंकड़ों के अनुसार, शुद्ध कर संग्रह चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमान 18.23 लाख करोड़ रुपये का 47.45 प्रतिशत रहा है. पिछले वित्त वर्ष 2022-23 में प्रत्यक्ष कर संग्रह 16.61 लाख करोड़ रुपये रहा था.

अग्रिम कर की दूसरी किस्त के भुगतान की अंतिम तिथि 15 सितंबर थी. मंत्रालय ने बयान में कहा कि 16 सितंबर तक 8,65,117 करोड़ रुपये के शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह में 4,16,217 करोड़ रुपये का कॉरपोरेट आयकर (सीआईटी) और प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) सहित 4,47,291 करोड़ रुपये का व्यक्तिगत आयकर (पीआईटी) शामिल है. बयान के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के लिए 16 सितंबर तक शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 23.51 प्रतिशत अधिक रहा है.

चालू वित्त वर्ष में सितंबर मध्य तक अग्रिम कर भुगतान 21 प्रतिशत बढ़कर 3.55 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो इससे पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 2.94 लाख करोड़ रुपये था. अग्रिम कर भुगतान 16 सितंबर तक 3.55 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें सीआईटी 2.80 लाख करोड़ रुपये और पीआईटी 74,858 करोड़ रुपये है.

समीक्षाधीन अवधि में आयकर विभाग ने करीब 1.22 लाख करोड़ रुपये का रिफंड जारी किया है. मंत्रालय ने कहा कि कुल मिलाकर वित्त वर्ष 2023-24 के लिए प्रत्यक्ष कर संग्रह 18.29 प्रतिशत बढ़कर 9.87 लाख करोड़ रुपये है, जो इससे पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 8.34 लाख करोड़ रुपये था.

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Monday, September 18, 2023

महिला आरक्षण का मुद्दा तीन दशकों से लटका, क्या अब पारित हो पाएगा यह विधेयक?

करीब 27 साल से लंबित महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पेश किए जाने के लिए नए सिरे से जोर दिए जाने के बीच आंकड़ों से पता चलता है कि लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 15 प्रतिशत से भी कम है जबकि कई राज्यों की विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत से भी कम है. 

इस मुद्दे से जुड़ा अंतिम ठोस घटनाक्रम 2010 में हुआ था, जब राज्यसभा ने हंगामे के बीच विधेयक को पारित कर दिया था. मार्शल ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के कदम का विरोध करने वाले कुछ सांसदों को बाहर कर दिया था. हालांकि, विधेयक लोकसभा से पारित नहीं हो सका और अटक गया.

भाजपा और कांग्रेस ने हमेशा विधेयक का समर्थन किया है लेकिन अन्य दलों के विरोध और महिला कोटा के भीतर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की कुछ मांगें ऐसी रहीं, जिसके चलते विधेयक पर सहमति नहीं बन सकी.

कई दलों ने महिला आरक्षण विधेयक पारित करने की वकालत की

रविवार को कई दलों ने सोमवार से शुरू होने वाले पांच दिवसीय संसद सत्र में महिला आरक्षण विधेयक लाने और पारित करने की जोरदार वकालत की, लेकिन सरकार ने कहा कि ‘‘सही समय पर उचित निर्णय लिया जाएगा.''

मौजूदा लोकसभा में 78 महिला सदस्य चुनी गईं, जो कुल संख्या 543 का 15 प्रतिशत से भी कम है. सरकार द्वारा पिछले दिसंबर में संसद के साथ साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्यसभा में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 14 प्रतिशत है.

कई विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत से कम 

आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और पुडुचेरी सहित कई राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत से कम है.

दिसंबर 2022 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 10-12 प्रतिशत महिला विधायक थीं. वहीं, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखंड क्रमश: 14.44 प्रतिशत, 13.7 प्रतिशत और 12.35 प्रतिशत के साथ महिला विधायक संबंधी सूची में सबसे आगे हैं.

पिछले कुछ हफ्तों में, बीजू जनता दल (बीजद) और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) सहित कई दलों ने महिला आरक्षण विधेयक को पेश करने की मांग की है, जबकि कांग्रेस ने भी रविवार को हैदराबाद में अपनी कार्य समिति की बैठक में इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया.

पूर्व में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण का प्रस्ताव था

हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि नए विधेयक में कितने प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव किया जा सकता है क्योंकि 2008 का विधेयक, जो लोकसभा में पारित नहीं होने के बाद 2010 में समाप्त हो गया था, में लोकसभा और प्रत्येक राज्य विधानसभा की सभी सीटों में से महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षित करने का प्रस्ताव था. जब विधेयक पारित कराने की आखिरी कोशिश की गई तो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सत्ता में था.

‘पीआरएस लेजिस्लेटिव' पर उपलब्ध एक लेख के अनुसार, इसमें अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और एंग्लो-इंडियन के लिए कोटा-के भीतर-कोटा का भी प्रस्ताव रखा गया था, जबकि आरक्षित सीटों को प्रत्येक आम चुनाव के बाद चक्रीय आधार पर बदला जाना था. इसका मतलब था कि तीन चुनावों के चक्र के बाद, सभी निर्वाचन क्षेत्र एक बार आरक्षित श्रेणी में आ जाते. यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए लागू होना था.

वर्ष 2008-2010 के असफल प्रयास से पहले, इसी तरह का विधेयक 1996, 1998 और 1999 में भी पेश किया गया था.



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रवीन्द्रनाथ टैगोर का शांतिनिकेतन UNESCO की विश्व धरोहर सूची में

पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है. शांतिनिकेतन में ही कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने एक सदी पहले विश्वभारती की स्थापना की थी. यूनेस्को ने रविवार को सोशल मीडिया ‘एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में यह घोषणा की. यूनेस्को ने कहा, ‘‘यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शांतिनिकेतन शामिल. भारत को बधाई.''पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित इस सांस्कृतिक स्थल को यूनेस्को की धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए भारत लंबे समय से प्रयास कर रहा था.

शांतिनिकेतन को इस सूची में शामिल करने का निर्णय सऊदी अरब में विश्व धरोहर समिति के 45वें सत्र के दौरान लिया गया. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि उन्हें खुशी और गर्व है कि शांतिनिकेतन को आखिरकार यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है. बनर्जी ने ‘एक्स' पर पोस्ट किया, ‘‘बिश्व बांग्ला के गौरव, शांतिनिकेतन को कवि ने तैयार किया था और पीढ़ियों से बंगाल के लोगों ने इसका सहयोग किया है. पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से हमने पिछले 12 वर्षों में इसके बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय वृद्धि की है और दुनिया अब इस धरोहर स्थल की महिमा को पहचानती है. उन सभी को बधाई जो बंगाल, टैगोर और उनके भाईचारे के संदेशों से प्यार करते हैं. जय बांग्ला, गुरुदेव को प्रणाम.''

शांतिनिकेतन को विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए एक दस्तावेज तैयार करने पर काम करने वाली प्रसिद्ध संरक्षण वास्तुकार आभा नारायण लांबा ने कहा कि वह खबर सुनने के बाद ‘‘खुशी से झूम उठीं.'' उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा' से कहा, ‘‘हमने 2009 में दस्तावेज पर काम किया था और शायद तब समय सही नहीं था. लेकिन हम हमेशा शांतिनिकेतन की सुंदरता में विश्वास करते थे और आज इसे यूनेस्को की सूची में देखकर इसकी पुष्टि हुई.'' मुंबई में रहने वालीं लांबा ने कहा कि एक बार जब ‘इकोमोस' ने इसे सूची में शामिल करने की सिफारिश की, तो यह लगभग निश्चित था कि ऐसा होगा.

कुछ महीने पहले, अंतरराष्ट्रीय परामर्श संस्था ‘इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स' (इकोमोस) द्वारा इस ऐतिहासिक स्थल को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की सिफारिश की गई थी. फ्रांस आधारित ‘इकोमोस' अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन है जिसमें पेशेवर, विशेषज्ञ, स्थानीय अधिकारी, कंपनियों और धरोहर संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं तथा यह दुनिया के वास्तुशिल्प एवं धरोहर स्थल के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित है.

यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र की आधिकारिक वेबसाइट पर दर्ज विवरण के मुताबिक, कोलकाता से 160 किमी दूर शांतिनिकेतन मूल रूप से रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देबेंद्रनाथ टैगोर द्वारा बनाया गया एक आश्रम था, जहां जाति और पंथ से परे कोई भी, आ सकता था और शिक्षा ले सकता था. इसमें कहा गया है कि महर्षि के नाम से प्रसिद्ध देबेंद्रनाथ टैगोर भारतीय पुनर्जागरण के अग्रणी व्यक्ति थे. महर्षि द्वारा निर्मित संरचनाओं में शांतिनिकेतन गृह और एक मंदिर था.

वेबसाइट पर कहा गया, ‘‘19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में निर्मित दोनों संरचनाएं शांतिनिकेतन की स्थापना और बंगाल तथा भारत में धार्मिक आदर्शों के पुनरुद्धार और पुनर्व्याख्या से जुड़ी सार्वभौमिक भावना के साथ अपने संबंध में महत्वपूर्ण हैं.'' भारत के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक शांतिनिकेतन में स्थित विश्वभारती में मानविकी, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, ललित कला, संगीत, प्रदर्शन कला, शिक्षा, कृषि विज्ञान और ग्रामीण पुनर्निर्माण में डिग्री पाठ्यक्रम की पेशकश की जाती है.

विश्वविद्यालय की स्थापना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी. 1951 में संसद के एक अधिनियम द्वारा इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया था. विश्वभारती पश्चिम बंगाल का एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय है और इसके कुलाधिपति प्रधानमंत्री हैं.

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Sunday, September 17, 2023

ब्रिटेन में आने वालों और छात्रों का वीजा शुल्क बढ़ाया गया, नई व्यवस्था चार अक्टूबर से लागू होगी

ब्रिटेन की सरकार ने भारत समेत दुनिया भर से देश में आने वाले आगंतुकों एवं छात्रों के लिए वीजा शुल्क में बढ़ोतरी करने की घोषणा की है और यह बढ़ोतरी आगामी चार अक्टूबर से प्रभावी होगी. आगंतुकों को अब छह महीने से कम अवधि वाले दौरे के वीजा के लिए 15 पाउंड और छात्र वीजा के लिए 127 पाउंड अधिक खर्च करने होंगे.

शुक्रवार को संसद में पेश किए गए अध्यादेश के बाद ब्रिटेन के गृह विभाग ने कहा कि बदलावों का मतलब है कि छह महीने से कम समय के दौरे के वीज़ा की लागत बढ़कर 115 पाउंड हो जाएगी और छात्र वीज़ा के आवेदकों को अब 490 पाउंड खर्च करना होगा.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने जुलाई में घोषणा की थी कि देश के सार्वजनिक क्षेत्र की वेतन वृद्धि को पूरा करने के लिए वीजा आवेदकों द्वारा ब्रिटेन की वित्त पोषित राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के लिए भुगतान की जाने वाली फीस और स्वास्थ्य अधिभार में बड़ी वृद्धि होने वाली है.

सुनक ने उस वक्त कहा था, ‘‘हम इस देश में आने वाले प्रवासियों के वीजा के लिए आवेदन करने पर लगने वाले शुल्क को बढ़ाने जा रहे हैं. इसे वस्तुत: आव्रजन स्वास्थ्य अधिभार (आईएचएस) कहा जाता है, जो एक प्रकार का लेवी (शुल्क) है जिसका वे एनएचएस तक पहुंचने के लिए भुगतान करते हैं.''

ब्रिटेन के गृह विभाग ने इस हफ्ते अधिकांश कार्य एवं यात्रा वीजा की लागत में 15 प्रतिशत की वृद्धि और प्राथमिकता वाले वीजा, अध्ययन वीजा और प्रायोजन के प्रमाण पत्र की लागत में कम से कम 20 प्रतिशत की वृद्धि का संकेत दिया था.

शुल्क में बढ़ोतरी स्वास्थ्य और देखभाल वीजा सहित अधिकांश वीज़ा श्रेणियों पर लागू की गई है.



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पीएम मोदी आज ‘पीएम विश्वकर्मा’ योजना की शुरुआत करेंगे, देश भर में होंगे आयोजन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रविवार को विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर कारीगरों और शिल्पकारों के पारंपरिक कौशल को बढ़ावा देने वाली ‘पीएम विश्वकर्मा' योजना की शुरुआत करेंगे. इस नई योजना का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को मान्यता और उनको समग्र समर्थन प्रदान करना है, ताकि उनके उत्पादों की गुणवत्ता, पैमाने और पहुंच में सुधार हो सके और उन्हें एमएसएमई वेल्यू चेन के साथ जोड़ा जा सके.

इस योजना के शुभारंभ पर सरकार की ओर से रविवार को लाभार्थियों के बीच व्यापक जागरूकता फैलाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में लगभग 70 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे.केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला कर्नाटक के मैंगलोर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि होंगे.

इस खास अवसर पर मैंगलोर में डॉ टीएमए पाई इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में 600 से अधिक कारीगर और शिल्पकार इसमें भाग लेंगे. इनमें पारंपरिक नौका निर्माता, मछली पकड़ने के जाल निर्माता, सुनार, बढ़ई, मूर्तिकार, दर्जी और कुम्हार आदि शामिल होंगे.

भारत की कला और शिल्प विशिष्ट, प्राचीनता, मूल्यों और दृढ़ विश्वास से समृद्ध हैं. पारंपरिक कारीगर और शिल्पकार, जिन्हें आम तौर पर 'विश्वकर्मा' कहा जाता है, कलात्मक क्षमता में काम करते हैं.यह कारीगर पारंपरिक उपकरणों और तकनीकों का उपयोग करके अपने हाथों से वस्तुएं बनाते हैं.

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के मुताबिक प्रधानमंत्री राजधानी के द्वारका स्थित इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन और एक्सपो सेंटर (आईआईसीसी) में इस योजना की शुरुआत करेंगे. 

केंद्र सरकार ने ‘पीएम विश्वकर्मा' योजना को शुरू करने की घोषणा केंद्रीय बजट 2023-24 में की थी. इस योजना के लिए वित्त वर्ष 2023-24 से वित्त वर्ष 2027-28 तक वित्तीय परिव्यय 13,000 करोड़ रुपये रखा गया है.

इस योजना का उद्देश्य अपने हाथों और औजारों से काम करने वाले कारीगरों और शिल्पकारों द्वारा पारंपरिक कौशल के अभ्यास को बढ़ावा देना और मजबूत करना तथा गुणवत्ता के साथ-साथ उनके उत्पादों और सेवाओं की पहुंच में सुधार करना भी है.

योजना में 18 पारंपरिक शिल्प कवर किए जाएंगे

‘पीएम विश्वकर्मा' के तहत 18 पारंपरिक शिल्प को कवर किया जाएगा. इनमें बढ़ई (सुथार), नाव निर्माता, अस्त्रकार, लोहार, हथौड़ा और टूलकिट निर्माता, ताला बनाने वाला, सुनार, कुम्हार, मूर्तिकार (पत्थर तराशने वाला), पत्थर तोड़ने वाला, चर्मकार/जूता बनाने वाला/फुटवियर कारीगर, राजमिस्त्री, टोकरी/चटाई/झाड़ू बनाने वाला, गुड़िया और खिलौना निर्माता (पारंपरिक), नाई, मालाकार, धोबी, दर्जी और मछली पकड़ने का जाल बनाने वाले शामिल हैं.



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अंग्रेजी की प्रख्यात लेखिका और बीजू पटनायक की बेटी गीता मेहता का निधन

ओडिशा के प्रसिद्ध राजनेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक की बेटी, प्रख्यात लेखिका, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता व पत्रकार गीता मेहता का आज दिल्ली में निधन हो गया. वे ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बड़ी बहन थीं. उनका विवाह प्रसिद्ध अमेरिकी प्रकाशक स्वर्गीय सन्नी मेहता से हुआ था.

सन 1943 में दिल्ली में बीजू पटनायक और ज्ञान पटनायक के घर जन्मीं गीता की शिक्षा भारत के अलावा ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हुई थी. उन्होंने पांच किताबें कर्मा कोला, स्नेक एंड लैडर, ए रिवर सूत्र, राज और द इटरनल गणेशा लिखी हैं.

सूत्रों ने बताया कि गीता मेहता अपने छोटे भाई नवीन पटनायक के बहुत करीब थीं. अपनी भुवनेश्वर की पिछली यात्रा के दौरान उन्होंने पत्रकारों से कहा था कि ''ओडिशा के लोग काफी भाग्यशाली हैं कि उन्हें नवीन पटनायक जैसा मुख्यमंत्री मिला.''

पीएम नरेंद्र मोदी ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में उनके निधन पर शोक व्यक्त किया. उन्होंने लिखा, "मैं प्रसिद्ध लेखिका गीता मेहता जी के निधन से दुखी हूं. वह एक बहुमुखी व्यक्तित्व थीं, जो लेखन के साथ-साथ फिल्म निर्माण के प्रति अपनी बुद्धि और जुनून के लिए जानी जाती थीं. वे प्रकृति और जल संरक्षण के प्रति भी भावुक थीं. दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं नवीन पटनायक जी और पूरे परिवार के साथ हैं. ओम शांति." 

ओडिशा के राज्यपाल गणेशी लाल ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है. उन्होंने 'एक्स' पर लिखा- "सीएम नवीन पटनायक की बहन, निपुण अंग्रेजी लेखिका गीता मेहता के निधन के बारे में जानकर दुख हुआ और शोक संतप्त परिवार और दोस्तों के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त की." 

गीता मेहता के निधन पर ओडिशा के कई मंत्रियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने शोक व्यक्त किया है.
 



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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 73वां जन्मदिन: उनके जीवन और करियर पर एक नजर

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर को अपना 73वां जन्मदिन मना रहे हैं. पूरे भारत में बीजेपी की इकाइयां उनके जन्मदिन को अलग-अलग तरीकों से मनाने की योजना बना रही हैं. भारत को आजादी मिलने के तीन साल बाद और गणतंत्र बनने से कुछ महीने पहले 17 सितंबर 1950 को जन्मे नरेंद्र मोदी दामोदरदास मोदी और हीरा बा मोदी की छह संतानों में से तीसरी संतान हैं.

अपने समाज सेवा और राजनीति के करियर के शुरुआती वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सदस्य थे. 1970 के दशक से राजनीति में सक्रिय होने के बावजूद 1990 के दशक के अंत तक उनके राजनीतिक करियर को कोई खास गति नहीं मिली थी.

नरेंद्र मोदी ने 1987 में गुजरात में भाजपा के महासचिव के रूप में काम करना शुरू किया. 1995 में पार्टी ने गुजरात में बहुमत हासिल किया और फिर वे तेजी से आगे बढ़े. नरेंद्र मोदी 7 अक्टूबर 2001 को अपनी पहली संवैधानिक भूमिका में सामने आए जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने. इस तिथि के बाद से वे निर्वाचित सरकार के नेता के रूप में काम करते रहे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न केवल सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं, बल्कि एक निर्वाचित सरकार के प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल सबसे लंबा है, जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनका 12 साल से अधिक का कार्यकाल शामिल है.

सन 2014 में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने सभी विपक्ष दलों को ध्वस्त कर दिया और चुनाव में जीत हासिल की. भाजपा तीन दशकों में बहुमत हासिल करने वाली पहली पार्टी बन गई.

नई दिल्ली पहुंचने से पहले पीएम मोदी ने 2001 से 13 वर्षों तक अपने गृह राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया. प्रधानमंत्री के रूप में उनका दूसरा कार्यकाल अगले वर्ष समाप्त होने वाला है. नरेंद्र मोदी अभी भी भारतीय राजनीति और देश के अधिकांश राजनीतिक विमर्श पर हावी हैं.



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